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"Can Astrology Explain Why You're Struggling to Conceive a Child?"

  • Apr 25, 2024
  • 3 min read

संसार का हर व्यक्ति शादी के बाद संतान सुख पाना चाहता है, किसी किसी को यह सुख शादी के बाद सही समय पे मिल जाता है ,वही कुछ लोगो को वैवाहिक जीवन के काफी समय बाद भी यह सुख नसीब नहीं होता,

इस के कारण उस दंपति को सामाजिक और परिवार वालो की तरफ से काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है खास कर के पत्नी को,

संतान ना होना इस के काफी अलग अलग कारण हो सकते है जेसे की पति पत्नी में से किसी को भी कोई मेडिकल सबंधित तकलीफ होना, शादी के बाद तुरंत संतान ना चाहने के वजह से कभी कराया हुआ ओबार्शन और इस के कुछ ज्योतिषी कारण भी होते है,

ज्योतिष शास्त्र में इस समस्या कारण पति पत्नी दोनो में से किसी एक या दोनों की कुंडली में ग्रह नक्षत्रों की गलत स्थिति को बताया गया है


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आइए आज हम बात करते है ऐसे कोन से ज्योतिषी कारण है जिस के संतान होने के प्रोब्लम आ रही है या तो देरी हो रही है ।


संतान सुख पता करने के लिए सबसे पहले हमें पंचम स्थान का विश्लेषण करना होगा. पंचम स्थान का मालिक किसके साथ बैठा है, यह भी जानना होगा. पंचम स्थान में गुरु शनि को छोड़कर पंचम स्थान का अधिपति पांचवें हो तो संतान संबंधित शुभ फल देता है. यदि पंचम स्थान का स्वामी आठवें, बारहवें हो तो संतान सुख नहीं होता. यदि हो भी तो सुख मिलता नहीं या तो संतान नष्ट होती है या अलग हो जाती है. वहीं अगर पंचम स्थान का अधिपति सप्तम, नवम, ग्यारहवें, लग्नस्थ, द्वितीय में हो तो संतान से संबंधित सुख शुभ फल देता है. द्वितीय स्थान के स्वामी ग्रह पंचम में हो तो संतान सुख उत्तम होकर लक्ष्मीपति बनता है.


ये ग्रह बनाते है संतान प्राप्ति में समस्या

  • पंचम स्थान संतान का होता है. वहीं विद्या का भी माना जाता है. पंचम स्थान कारक गुरु और पंचम स्थान से पंचम स्थान (नवम स्थान) पुत्र सुख का स्थान होता है. पंचम स्थान गुरु का हो तो हानिकारक होता है, यानी पुत्र में बाधा आती है.

  • सिंह लग्न में पंचम गुरु वृश्चिक लग्न में मीन का गुरु स्वग्रही हो तो संतान प्राप्ति में बाधा आती है. लेकिन जब गुरु की पंचम दृष्टि हो या पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो संतान सुख उत्तम मिलता है.

  • पंचम स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो तो प्रथम संतान के बाद पिता का भाग्योदय होता है. यदि ग्यारहवें भाव में सूर्य हो तो उसकी पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र अत्यंत प्रभावशाली होता है. मंगल की यदि चतुर्थ, सप्तम, अष्टम दृष्टि पूर्ण पंचम भाव पर पड़ रही हो तो पुत्र होता है.

  • यदि पंचम स्थान पर बुध का संबंध हो और उस पर चंद्र या शुक्र की दृष्टि पड़ रही हो तो वह संतान होशियार होती है. पंचम स्थान का स्वामी शुक्र यदि पुरुष की कुंडली में लग्न में या अष्टम में या तृतीय भाव पर हो और सभी ग्रहों में बलवान हो तो लड़की होती है.

  • अगर पंचम स्थान पर मकर का शनि कन्या संतति अधिक होता है. कुंभ का शनि भी लड़की देता है. पुत्र की चाह में पुत्रियां होती हैं.


संतान सुख में कब आती है दिक्कतें

  • पंचम स्थान का अधिपति छठे में हो तो दत्तक पुत्र लेने का योग बनता है. वहीं अगर पंचम स्थान में मीन राशि का गुरु कम संतान देता है.

  • पंचम स्थान में धनु राशि का गुरु हो तो संतान तो होगी, लेकिन स्वास्थ्य कमजोर रहेगा.

  • गुरु का संबंध पंचम स्थान पर संतान योग में बाधा देता है. सिंह, कन्या राशि का गुरु हो तो संतान नहीं होती,

  • तुला राशि का शुक्र पंचम भाव में अशुभ ग्रह के साथ राहु-केतु और शनि के साथ हो तो संतान नहीं होती है.

  • पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक राशि हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो पुत्र संतान सुख नहीं होता.

  • पंचम स्थान पर पड़ा राहु गर्भपात कराता है.

  • पंचम भाव में गुरु के साथ राहु हो तो चांडाल योग बनता है और संतान सुख प्राप्ति में बाधा आती है.

  • कुंडली में नीच का राहु भी संतान नहीं देता. यदि राहु, मंगल, पंचम भाव में हो तो एक संतान होती है.

  • पंचम स्थान में पड़ा चंद्र, शनि, राहु भी संतान सुख प्राप्ति में बाधक होता है. यदि योग लग्न में न हों तो चंद्र कुंडली देखना चाहिए.


NOTE:-संतान ना होने की स्थिति में पति पत्नी दोनो की कुंडली देखनी जरूरी होती है,दोनो में से किसी की भी कुंडली में यह दोष होने से संतान होने में बाधा आती है, इस समस्या के लिए सिर्फ पत्नी को दोष देना गलत होगा जो की हमारे समाज में अक्सर देखा गया है ,

हो सकता है की पति की कुंडली में भी कोई दोष हो सकता है,

किसी विद्वान एस्ट्रोलॉजर से सलाह लेके इस का निवारण करे।

 
 
 

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